सलाम : 89 की उम्र में भी पीएचडी करना चाहता है ये स्वतंत्रता सेनानी

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बढ़ती उम्र तजुर्बा समेटती है. सपनों में उड़ान हो मेहनत में शिद्दत हो तो उम्र महज एक संख्या है. इसी का जीता जागता उदाहरण हैं 89 वर्षीय शरणबासवराज बिसराहल्ली.

कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले शरणबासवराज बिसराहल्ली ने हाल ही में पीएचडी में दाखिला लेने के लिए प्रवेश परीक्षा दी है. आपको बता दें कि शरणबासवराज एक पूर्व स्वतंत्रता सेनानी रह चुके हैं, इतना ही नहीं वह समाज सेवा के कार्यों में भी शामिल रहे हैं.

15 से ज्यादा किताबें लिख चुके शरणबासवराज का हमेशा से ही सपना रहा है कि वे कन्नड़ साहित्य में अपनी पीएचडी की पढ़ाई पूरी करें.

साल 1929 में जन्में शरणबासवराज अध्यापक भी रह चुके हैं और उन्हें बचपन से ही पढ़ाई में बेहद दिलचस्पी रही है. जिस वजह से उन्होंने कानून की पढ़ाई में डिग्री हासिल की. जब इतने से भी उनका मन नहीं भरा तो उन्होंने कर्नाटक यूनिवर्सिटी (धारवाड़) और हम्पी कन्नड़ यूनिवर्सिटी से दो बार मास्टर्स तक कर डाला.

पूर्व स्वतंत्रता सेनानी का कहना है कि ”पढ़ाई की कोई उम्र सीमा नहीं होती. मेरा ऐसा मानना है कि मेरी जिंदगी का उद्देश्य एक छात्र होना और ज्ञान अर्जित करना है. हां शायद उम्र मेरा साथ छोड़ दे पर मैं सीखना कभी भी बंद नहीं करूंगा.”

हमेशा से ही समाज का भला सोचने वाले बिसराहल्ली ने पिछड़ी जाति के तीन बच्चों के जीवन को भी संवारा. आज ये तीनों बच्चे सरकारी पदों पर नौकरी कर रहे हैं. उनमें से एक पीडब्ल्यूडी का अधीक्षक है, दूसरा कर्नाटक पुलिस विभाग में एक सहायक उप-निरीक्षक है और तीसरा दूरसंचार विभाग के साथ काम कर रहा है.

साल 1991 में बिसराहल्ली ने कानून का अधय्यन करने की ठानी. हालांकि उन्हें इसका कोई अभ्यास नहीं था. वह बताते हैं कि ”कम्र उम्र में भारत के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते, उनकी रुचि हमेशा से ही कानून के अध्ययन में रही है, क्योंकि शायद इससे उन्हें देश के कानूनों को व्यवस्थित तरीके से समझने में मदद मिले.”

पीएचडी करने के इस सफर में बिसराहल्ली को कई अड़चनों का सामना भी करना पड़ा. दरअसल, पीएचड़ी करने के लिए मास्टर्स में 55 प्रतिशत अंकों की जरूरत होती है जो उनके नहीं थे. मगर वो टूटे नहीं और उन्होंने एकबार फिर से मास्टर्स किया और इस बार 66 फीसदी अंक हासिल किए.

इसी कड़ी में शरणबासवराज से जब पूछा गया कि उन्होंने पहले ही पीएचडी की डिग्री क्यों नहीं कर ली तो उन्होंने कहा, ”उस वक़्त मुझे पर निजी जिम्मेदारियां थीं और पीएचडी के लिए आपको बहुत समर्पण की जरूरत होती है.”

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