यूं ही नहीं दीदी बन गई थीं ममता..लेफ्ट की हिंसा में झुलसकर बनी थी सोना, खूनी है बंगाल का राजनीतिक इतिहास

Mamta

आज के वक्त में शायद पहले से काफी कम चुनावी हिंसा होनी लगी है. लेकिन इस दौर में भी ममता बनर्जी शासित पश्चिम बंगाल अपना पुराना रक्त चरित्र पीछे नहीं छोड़ पाता. थोड़े-थोड़े बस किरदार बदल जाते हैं.

इतिहास के पन्ने अगर पलटेंगे तो एक बात सामने जरूर आएगी कि पश्चिम बंगाल की चुनावी और सियासी फिजा उस जमाने से खून से रंगी रही है.

आपको बता दें कि 1960 के दशक में ही सत्ता पर दबदबे के लिए कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट में खूनी जंग तेज हो गई थी. 1977 में कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़कर पश्चिम बंगाल में जब लेफ्ट फ्रंट की सरकार ज्योति बसु के नेतृत्व में बनी तो फिर कांग्रेस धीरे-धीरे सिमटते चली गई.

वहीं दूसरी तरफ ज्योति बसु से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्जी तक लेफ्ट फ्रंट 34 साल तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रही. इन नेताओं के राज में ही 1977 से 2007 के बीच पश्चिम बंगाल में करीब 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं. ममता का भी सियासी संघर्ष कांग्रेस से ही शुरु हुआ लेकिन ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बना लिया. बंगाल की सड़कों और गलियों में लेफ्ट के खिलाफ किसी ने जी जान से लड़ाई लड़ी तो वो ममता बनर्जी हैं.

21वीं सदी का पश्चिम बंगाल लेफ्ट फ्रंट और टीएमसी के संघर्षों से लाल होता रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट राज में 2001 में 21, 2002 में 19, 2003 में 22, 2004 में 15, 2005 में 8, 2006 में 7, 2007 में 20, 2008 में 9 राजनीतिक हत्याएं हुईं, लेकिन ये आंकड़ा अचानक 2009 में बढ़ गई जब राजनीतिक हत्याओ की गिनती पचास तक पहुंच गई. 2010 में ये संख्या थोड़ी घटी लेकिन 38 तक रही.

ममता ने इन सबको मुद्दा बनाया और 2011 में बंगाल से लाल किला को ध्वस्त कर दिया, लेकिन पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाएं कम नहीं हुईं. 2011 में ही 38 राजनीतिक हत्याएं हुईं. 2012 में 22, 2013 में 26, 2014 में 10, 2015 में एक और 2016 में एक राजनीतिक हत्या हुई.

अगर आंकड़े की बात करें तो पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाओं में काफी कमी आई है लेकिन बीजेपी का आरोप रहा है कि बंगाल तो ममता की खूनी राजनीति से लाल होता रहा है, तो इससे साफ है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति कांग्रेस बनाम लेफ्ट, लेफ्ट बनाम टीएमसी और अब टीएमसी बनाम बीजेपी की लड़ाई तक पहुंच गई है.

पिछले साल बंगाल में पंचायत चुनावों में काफी हिंसा हुई थी. इस बार लोकसभा चुनाव में वैसी हिंसा तो नहीं हुई लेकिन 2019 के चुनाव में सबसे ज्यादा लोगों की नजरें किसी राज्य पर टिकी रहीं तो वो पश्चिम बंगाल ही है.

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