स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद कूड़े का ढेर बना भारत, आयात में अमेरिका-यूरोप से निकला आगे

जी हां…मोदी जी 2014 चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे. तब से ही स्वच्छ भारत का नारा पूरे देश में गूंज रहा है. मगर ऐसा लग रहा है कि देश और गन्दा होता जा रहा है. मोदी सरकार को लगता है कि केवल शौचालयों के निर्माण से ही देश साफ़ हो जाएगा, पर ऐसा होता नहीं है.

देश के हर कोने में कचरा जमा है कहीं रोड़ के किनारे तो कहीं ओर.

आप हम और सबने ये हालत तो देखते ही हैं, मगर आपको बता दें वो चीज जो आपको शायद नहीं पता होगी. तो क्या आप जानते हैं कि हमारा देश अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों का सबसे बड़ा कचराघर है.

इन देशों के रद्दी कागज़, प्लास्टिक, धातु और इलेक्ट्रोनिक कचरा कानूनी या गैरकानूनी तरीके से हमारे देश में भेज दिए जाते हैं.

आपको बताते चलें कि इन कचरों पर आधारित सबसे अधिक उद्योग हमारे देश में हैं, जो इनसे नए पदार्थ बनाते हैं. इसके साथ ही इन उद्योगों से बेतहाशा प्रदूषण उत्पन्न होता है, पर कुछ गिने-चुने उद्योग ही इस प्रदूषण को नियंत्रित करते हैं. ऐसे अधिकतर उद्योग असंगठित क्षेत्र में हैं, जो प्रदूषण के सबसे बड़े स्त्रोत हैं.

आंकडों के मुताबिक दो वर्ष पहले तक चीन ऐसे कचरे का सबसे बड़ा बाजार था और साथ ही वायु प्रदूषण का पर्याय भी था, पर जनवरी 2018 में चीन ने अपने देश के वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से यूरोप और अमेरिका के कचरे के आयात पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इसके पहले तक दुनियाभर के कागज़, धातु और प्लास्टिक के कचरे का लगभग आधा भाग चीन पहुंचता था.

यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि दुनिया के सबसे प्रदूषित 25 शहरों में से महज 2 शहर चीन के हैं और राजधानी बीजिंग इस सूची में 122वें स्थान पर है.

आपको वो दौर तो याद ही होगा जब केजरीवाल जी ने ऑड-इवन का फार्मूला अपनाया था ताकि प्रदूषण कम हो पर हुआ क्या घंटा.

इसके विपरीत, हमारी सरकार वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने का नाटक तो करती है पर कचरे के आयात का दिल खोल कर स्वागत करती है.

दुनिया के 25 सबसे प्रदूषित शहरों में से 20 भारत के हैं और दिल्ली इस सूची में 11वें स्थान पर है.

गौरतलब है कि चीन ने जब दुनियाभर के कचरे के आयात को बंद कर दिया, तब विकसित देशों को भारत का सहारा मिला.