दिल्ली में खराब श्रेणी में वायु गुणवत्ता, पराली जलाए जाने से बढ़ सकता है प्रदूषण

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली (Delhi AQI) में वायु की गुणवत्ता शनिवार को ‘खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई लेकिन हवा की गति ठीक होने से इसमें आंशिक सुधार होने की संभावना है. सरकारी एजेंसियों ने यह जानकारी दी. बृहस्पतिवार को दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर पिछले आठ महीने में सबसे ज्यादा दर्ज किया गया लेकिन शुक्रवार को हवा की गति ठीक होने से प्रदूषक कण में बिखराव हुआ और वायु गुणवत्ता में सुधार दर्ज की गई. वहीं पराली जलाए जाने ने दिल्ली में पीएम 2.5 कण के जमा होने में 18 फीसदी का योगदान दिया है.

शहर में सुबह 10 बजे वायु गुणवत्ता सूचकांक 263 दर्ज किया गया. शुक्रवार को यह 239 दर्ज किया गया और बृहस्पतिवार को यह 315 दर्ज किया गया, जो कि इस साल 12 फरवरी को दर्ज किए गए आंकड़े 320 से खराब है. वायु गुणवत्ता 0 से 50 के बीच ‘अच्छा’, 51 से 100 के बीच ‘संतोषजनक’ और 101 से 200 के बीच ‘मध्यम’ और 201 से 300 के बीच ‘खराब’ और 301 से 400 के बीच ‘बेहद खराब’ और 401 से 500 के बीच ‘गंभीर’ श्रेणी में मानी जाती है.

भारत मौसम विज्ञान केंद्र (आईएमडी) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि शुक्रवार को हवा की अधिकतम गति 10 किलोमीटर प्रति घंटा थी. शनिवार को इसके 12 किलोमीटर प्रति घंटा होने की संभावना है. हवा की गति शांत रहने और ठंडे मौसम की वजह से प्रदूषक कणों का बिखराव नहीं हो पाता है. शनिवार को हवा की गति उत्तर से उत्तर पश्चिम की ओर रहने की संभावना है, जिससे दिल्ली में वायु गुणवत्ता पर पराली जलाने का असर बढ़ सकता है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वायु गुणवत्ता पूर्व चेतावनी प्रणाली ने बताया है कि शनिवार को प्रदूषक कणों के बिखराव के लिए हवा की गति अनुकूल है.

वायु गुणवत्ता एवं मौसम पूर्वानुमान एवं अनुसंधान (सफर) के अनुसार दिल्ली के पीएम 2.5 कणों के जमाव में पराली जलाए जाने का योगदान बृहस्पतिवार को छह फीसदी रहा और शुक्रवार को यह 18 फीसदी तक पहुंच गया. दिल्ली में वायु गुणवत्ता का गंभीर श्रेणी में पहुंच जाना एक सालाना परेशानी है और इसके लिए हवा की गति, पड़ोसी राज्यों में खेतों में आग लगाया जाना और स्थानीय प्रदूषण स्रोत जिम्मेदार हैं. दिल्ली के एक थिंक टैंक ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वारनमेंट एंड वाटर’ के विश्लेषण के अनुसार दिल्ली में 18 से 39 फीसदी वायु प्रदूषण परिवहन की वजह से है. इसके बाद शहर में सड़कों की धूल 18 से 38 फीसदी तक वायु प्रदूषण में योगदान देते हैं. वहीं उद्योग भी 2 से 29 प्रतिशत और थर्मल पॉवर प्लांट (तीन से 11 फीसदी) और निर्माण से आठ फीसदी तक योगदान देता है.