मिशन यूपी :प्रियंका गाँधी की 6 बड़ी बाधाएँ ,कैसे करेंगी पार

प्रियंका गाँधी ने आज पहली बार लखनऊ में एक रोड शो के साथ अपनी सियासी पारी की शुरुआत की है| कांग्रेस के लकी रथ और माथे पर रहस्यमय काले टीके के साथ रोड शो पर निकले राहुल और प्रियंका पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरते चले जा रहे थे | क्या प्रियंका की एंट्री रोड शो के माहौल से आगे निकल यूपी कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भर पाएगी? यह बड़ा सवाल है| आप को बताते चलें कि कांग्रेस की लगातार यूपी में हार से हाशिए पर पहुंची पार्टी को नए तेवर के साथ-साथ नए कलेवर की भी ज़रूरत है। इसके चलते ही ये ज़िम्मेदारी प्रियंका गाँधी को दी गयी है | सक्रिय राजनीति में उतरने के बाद प्रियंका गांधी को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह है। और ‘प्रियंका नहीं ये आंधी है, दूसरी इंदिरा गांधी है’ व ‘प्रियंका गांधी आई है, नयी रोशनी लाई है’ जैसे नारे भी कार्यकर्ताओं में एक नया जोश तो फूंक रहे हैं| लेकिन आने वाले दिनों में प्रियंका गाँधी की चुनौतियां कम नहीं होने वाली है| आइये जानते है प्रियंका की वो 6 चुनौतियों कौन सी हैं, जो उनके सामने आने वाली है|

rahul gandhi priyanka gandhi

संगठन स्लीप मोड में और चुनाव सर पर

कांग्रेस पार्टी के सामने उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती संगठन की कमजोर हालत है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जिस कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 21 सीटें मिली थी, वही कांग्रेस 2014 में महज दो सीटों पर सिमट कर रह गई. 1989 में सूबे की सत्ता हाथ से जाने के बाद क्षेत्रीय पार्टियों के उभार के दौर में कांग्रेस का संगठन कमजोर होता चला गया। चुनाव दर चुनाव कार्यकर्ता पार्टी से दूर होते चले गए | प्रियंका गांधी के आने के बाद थोड़ी हलचल जरूर हुई है, लेकिन अभी भी सबसे बड़ी चुनौती कैडर और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने और उन्हें जगाने की है | उत्तर प्रदेश में किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन कांग्रेस ने नुमाइंदगी नहीं की है|

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बड़े नेताओं की कमी

कांग्रेस को हमेशा ही उत्तर प्रदेश में बड़े नेताओं की कमी से जूझना पड़ा। बदलते दौर में कांग्रेस के कद्दावर नेताओं ने क्षेत्रीय पार्टियों (एसपी-बीएसपी) या फिर बीजेपी में अपनी जगह बना ली। लंबे अरसे से सक्रिय जगदंबिका पाल और रीता बहुगुणा जोशी जैसे नेताओं ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया। वहीं अखिलेश प्रताप को बस टीवी डिबेट में देखा जाता है| इसलिए उत्तर प्रदेश में माहौल बनाने में प्रियंका को काफी मश्कत करनी पड़ेगी|

मज़बूत सीटों को पक्की जीत में बदलना

उत्तर प्रदेश में करीब दो दर्जन सीटों पर कांग्रेस की मज़बूत स्थिति देखी जा सकती है। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस २ सीटों पर ही जीत दर्ज कर पायी थी | लेकिन कुछ सीटों पर कांग्रेस को ठीक-ठाक वोट मिले थे. पश्चिमी यूपी की सहारनपुर व गाजियाबाद जैसी सीट पर कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन उसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे| तो ऐसे में देखना होगा कि क्या प्रियंका “पूर्वी उत्तर प्रदेश” की ऐसी ही सीटों को जीत में बदल पाएंगी?

वोट बैंक

कांग्रेस के पारंपरिक वोटर पिछले कुछ वर्षों में लगातार पार्टी से छिटकते गए. 2014 के चुनावों में भाजपा को इसका लाभ मिला. कभी दलितों और मुसलमानों के बीच मजबूत पैठ रखने वाली कांग्रेस का वोट बैंक सिकुड़ चुका है। जहां एक ओर दलित कांग्रेस छोड़ बीएसपी की नाव पर सवार हो चुके हैं, वहीं मुसलमानों का झुकाव एसपी की ओर ज्यादा है। कांग्रेस को उम्मीद थी कि अगर वह सपा-बसपा के साथ गठबंधन के तहत चुनाव में उतरती तो उसे सवर्ण वोटरों के साथ दूसरे तबकों का भी साथ मिलता, लेकिन अब स्थिति बदल गई है, दूसरी ओर केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण का कानून पास करवाते हुए कांग्रेस को चौंका दिया। जातियों में बंटी यूपी की जटिल सियासत को साध पाना प्रियंका के लिए आसान नहीं होगा।

पूर्वांचल का किला भेदना

आप को बता दे की प्रियंका गाँधी को महासचिव बनने के बाद जिस किले की ज़िम्मदार दी गई है, वो “पूर्वांचल” किला बीजेपी महारथियों का गढ़ है। इसमें दो बड़े किलों गोरखपुर और वाराणसी को भेदना प्रियंका की सबसे बड़ी जीत हो सकती है, अगर वो इसमें कामयाब हो पाईं | गोरखपुर सीट पर आदित्यनाथ का दबदबा है और वाराणसी प्रधानमंत्री की सीट है। इनके अलावा 43 सीटों पर प्रियंका की ज़िम्मेदारी होगी | अब तक अमेठी और रायबरेली तक सीमित रहीं प्रियंका को इस बड़े क्षेत्र के जमीनी हालात और समस्याओं को समझना बड़ी चुनौती होगा।

परिवारवाद और परिवार पर आरोप

प्रियंका को आने वाले लोकसभा चुनाव में परिवार को लेकर परेशानियाँ झेलनी पड़ेगी, क्यूंकि हाल ही में उनके पति रॉबर्ट वाड्रा से मनी लॉन्डरिंग के आरोप में ईडी ने पूछताछ की है। विरोधी, विशेषकर बीजेपी इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी को घेरते भी रहे है| बीजेपी तो मनी लॉन्डरिंग के आरोप लगाने के साथ-साथ परिवारवाद पर भी कांग्रेस को घेरती रहती है| सोशल मीडिया पर भी प्रियंका के खिलाफ कम्पैन चलते रहे है| ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रियंका इतनी जटिल सियासत को कैसे अपने लिए आसान बनाती हैं |